
रात के सन्नाटे में बस आगे बढ़ रही थी। उसकी हल्की पीली लाइटों से धुंधली परछाइयाँ बन रही थीं, जिनसे बस की आखिरी सीट पर बैठे आरव और मीरा की अपनी गुप्त दुनिया पर बस थोड़ी सी रोशनी पड़ रही थी। आरव का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था; मीरा की बेबाक हरकत - शर्ट के अंदर से ब्रा उतारना, घुटने से उसकी जांघ को छूना और आँखों से और भी कुछ करने का इशारा करना - ने उसके होश उड़ा दिए थे। उनकी गोद में पड़ी शॉल एक ढाल की तरह थी, जो आस-पास ऊंघते या बातें करते यात्रियों से उनके इस गुपचुप खेल को छिपाए हुए थी। मीरा की ढीली सूती पतलून उसके शरीर के उभारों को दिखा रही थी और बटन वाली शर्ट बिना ब्रा के उसके स्तनों से चिपकी हुई थी। सालों की पाबंदियों से आज़ाद होने के बाद उसकी चाहत और बढ़ गई थी और उसमें एक तरह का बेबाक सुकून था। शर्मीला और कांपता हुआ आरव उसके जादू में बंधा हुआ था; उसकी जेब में मीरा की दी हुई पैंटी रखी थी और उसका शरीर मीरा के अगले कदम का इंतज़ार कर रहा था।











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